पहली के गणित पेपर में केले, फूल और छतरी गायब, छह साल के बच्चे ढूंढ़ते रहे—गिनें क्या, रंग भरें कहां?
चित्र आधारित 20 अंकों के सवाल, लेकिन प्रश्नपत्र में चित्र ही नहीं; डीईओ बोले—‘त्रुटिपूर्ण नहीं है’, सवाल यह कि फिर बच्चे जवाब दें कैसे?

सीजीएन न्यूज़ | कवर्धा
कबीरधाम जिले में कक्षा पहली की त्रैमासिक परीक्षा की व्यवस्था ने शिक्षा विभाग की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। छह साल की उम्र के बच्चों के लिए तैयार गणित के प्रश्नपत्र में करीब 20 अंक के सवाल चित्रों और आकृतियों पर आधारित थे, लेकिन कई सवालों में जरूरी चित्र और आकृतियां प्रिंट ही नहीं हुईं। नतीजा यह हुआ कि बच्चे ढाई घंटे की परीक्षा में सवाल हल करने के बजाय यह समझने में उलझे रहे कि आखिर गिनना क्या है, जोड़ी किसकी बनानी है और रंग किस चित्र में भरना है।
सबसे गंभीर बात यह है कि प्रश्नपत्र तैयार करने और स्कूलों तक पहुंचाने से पहले इसकी जांच किस स्तर पर हुई, इसका स्पष्ट जवाब अब तक सामने नहीं आया है।
चित्र गायब, शिक्षक ने बोर्ड पर बनाकर समझाया
कक्षा पहली के गणित के 30 अंकों के प्रश्नपत्र में प्रश्न क्रमांक-4 में समान आकृतियों की जोड़ियां मिलाने के लिए 5 अंक निर्धारित थे। प्रश्न में विकल्प दिए गए, लेकिन जिन आकृतियों को देखकर बच्चों को जोड़ियां मिलानी थीं, वे ही गायब थीं।
ऐसे में शिक्षक के सामने दो ही विकल्प रह गए—या तो बच्चे सवाल छोड़ दें या फिर शिक्षक खुद ब्लैकबोर्ड पर चित्र बनाकर बच्चों को प्रश्न समझाएं। कई जगह यही किया गया।
एक अन्य सवाल में 6 और 9 के बीच की संख्याओं से संबंधित प्रश्न में भी उत्तर लिखने की जगह और पूछे गए सवाल के बीच तालमेल पर सवाल उठ रहे हैं। पहली कक्षा के बच्चों के स्तर को देखते हुए प्रश्नपत्र की ऐसी खामियां परीक्षा की पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े करती हैं।
हिंदी के पेपर में भी सामने आ चुकी है गड़बड़ी
यह पहली बार नहीं है जब प्रश्नपत्र में ऐसी समस्या सामने आई हो। 21 सितंबर को पहली कक्षा की हिंदी परीक्षा में भी चित्र आधारित सवाल में संबंधित चित्र उपलब्ध नहीं था। मगर के चित्र में रंग भरने के सवाल के लिए शिक्षक को ब्लैकबोर्ड पर खुद मगर बनाना पड़ा। बच्चों ने पहले बोर्ड से देखकर अपनी कॉपी में चित्र बनाया और फिर उसमें रंग भरा।
यानी परीक्षा सिर्फ बच्चे नहीं दे रहे थे, बल्कि प्रश्नपत्र की अधूरी तैयारी को पूरा करने का काम भी शिक्षक कर रहे थे।
न प्रश्नपत्र, न उत्तरपुस्तिका—कॉपी के पन्ने फाड़कर परीक्षा
पहली से आठवीं तक की परीक्षा व्यवस्था को लेकर एक और बड़ा सवाल है। बच्चों को अलग से प्रश्नपत्र और उत्तरपुस्तिका उपलब्ध नहीं कराई जा रही है। स्कूलों को परीक्षा से करीब दो घंटे पहले प्रश्नपत्र की पीडीएफ भेजी जाती है। इसके बाद शिक्षक उसे ब्लैकबोर्ड पर लिखते हैं और बच्चे पहले सवाल कॉपी में उतारते हैं, फिर उसका उत्तर लिखते हैं।
कुछ स्कूलों में समय बचाने के लिए प्रश्नपत्र की फोटोकॉपी कराकर परीक्षा कराई जा रही है। उत्तरपुस्तिका नहीं होने के कारण कई बच्चों को कॉपी के पन्ने फाड़कर उत्तर लिखकर जमा करना पड़ रहा है।
जिला स्तर की समिति ने तैयार किया प्रश्नपत्र, फिर गलती क्यों नहीं पकड़ी?
विभाग के अनुसार प्रश्नपत्र राज्य से मिले ब्लूप्रिंट के आधार पर जिला स्तर पर विषयवार शिक्षकों की समितियों ने तैयार किए हैं। इसके बाद इन्हीं प्रश्नपत्रों को स्कूलों में परीक्षा के लिए भेजा गया।
अब सवाल सीधे शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर है—जब प्रश्नपत्र तैयार हुआ, उसकी जांच हुई, अंतिम रूप दिया गया और फिर स्कूलों तक भेजा गया, तो चित्र गायब होने जैसी बुनियादी गलती किसी स्तर पर क्यों नहीं पकड़ी गई?
छह साल के बच्चों के लिए तैयार प्रश्नपत्र में यदि बच्चे को जिस चित्र को देखकर उत्तर देना है, वही चित्र उपलब्ध नहीं है, तो जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है।
डीईओ बोले—‘चित्र नहीं था तो शिक्षक बोर्ड पर बनाएंगे’
जिला शिक्षा अधिकारी एफआर वर्मा से जब पूछा गया कि पहली कक्षा के गणित के 30 में से करीब 20 अंक के सवाल चित्र और आकृतियों पर आधारित थे, लेकिन प्रश्नपत्र में चित्र ही नहीं थे, तो उनका कहना था कि विषयवार शिक्षकों ने प्रश्नपत्र तैयार किए हैं। चित्र नहीं दिए गए थे तो शिक्षक बच्चों के सामने बोर्ड पर चित्र बनाएंगे और बच्चे उसे देखकर अपनी कॉपी में उतारकर जवाब लिखेंगे।
जब उनसे पूछा गया कि क्या यह प्रश्नपत्र की त्रुटि नहीं है, तो उन्होंने इसे ‘त्रुटिपूर्ण नहीं’ बताया।
प्रश्नपत्र और उत्तरपुस्तिका उपलब्ध नहीं होने के सवाल पर डीईओ ने कहा कि प्रश्नपत्र की पीडीएफ स्कूलों को भेजी जाती है और शिक्षक आवश्यकता के अनुसार बोर्ड पर प्रश्न लिखवाते हैं।
वहीं, त्रुटिपूर्ण प्रश्नपत्रों के मूल्यांकन और शिक्षक संगठनों द्वारा उठाए जा रहे सवालों पर उन्होंने फिलहाल कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया।
बड़ा सवाल: परीक्षा बच्चों की या व्यवस्था की परीक्षा?
पहली कक्षा के छह साल के बच्चों से परीक्षा में यह अपेक्षा की जाती है कि वे दिए गए चित्रों, आकृतियों और सवालों को देखकर अपनी समझ के अनुसार उत्तर दें। लेकिन जब चित्र ही गायब हों, प्रश्न बोर्ड पर दोबारा बनाए जाएं और उत्तर लिखने के लिए बच्चों को अपनी कॉपी के पन्ने फाड़ने पड़ें, तो यह सिर्फ परीक्षा व्यवस्था की कमी नहीं, बल्कि परीक्षा की गुणवत्ता और बच्चों की सुविधा पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि शिक्षा विभाग इस पूरे मामले में प्रश्नपत्र तैयार करने वाली समिति की जिम्मेदारी तय करता है या फिर छह साल के बच्चों को ही अधूरे प्रश्नपत्र की परीक्षा का खामियाजा भुगतना पड़ेगा।




