कबीरधामकवर्धा

50 लाख का नेचर कैंप बना भ्रष्टाचार और लापरवाही की मिसाल, अब सिर्फ चबूतरे बचे

  1. ब्रजेश गुप्ता
    रेंगाखार वन परिक्षेत्र में करोड़ों के विकास के दावों के बीच एक ऐसा सरकारी प्रोजेक्ट सामने आया है, जो अब बदहाली और लापरवाही की कहानी बयां कर रहा है। वर्ष 2011-12 में करीब 50 लाख रुपए की लागत से बनाया गया नेचर कैंप टेंट हाउस आज पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो चुका है। मौके पर केवल कंक्रीट के चबूतरे बचे हैं, जबकि पूरा ढांचा और लाखों का सामान गायब हो चुका है।
    करीब दो एकड़ क्षेत्र में विकसित इस कैंप में 6 स्विस टेंट, किचन, ओपन डाइनिंग एरिया, बाथरूम, मिट्टी का घर, फेंसिंग और गेट जैसी सुविधाएं बनाई गई थीं। शुरुआत में यहां अन्य जिलों और राज्यों से छात्र नेचर एजुकेशन और वन्य जीवन प्रशिक्षण के लिए आते थे। लेकिन कुछ ही वर्षों में रखरखाव के अभाव और वन विभाग की उदासीनता के चलते यह कैंप बंद हो गया और धीरे-धीरे पूरी तरह उजड़ गया।
    सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इतने बड़े स्तर पर टेंट, लोहे के गेट, दरवाजे-खिड़कियां और अन्य सामग्री गायब हो जाने के बावजूद वन विभाग ने न तो कोई जांच कराई और न ही थाने में शिकायत दर्ज कराई। इससे विभाग की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
    यह कैंप छात्रों को जंगल और पर्यावरण से जोड़ने के उद्देश्य से बनाया गया था, जहां 36 बच्चों के रुकने की व्यवस्था थी। लेकिन आज यह प्रोजेक्ट सरकारी लापरवाही और संसाधनों की बर्बादी का प्रतीक बन चुका है।
    इधर, रेंगाखार क्षेत्र के गोपीखार में पिछले दो वर्षों से नया रिसॉर्ट प्रोजेक्ट तैयार किया जा रहा है। इसमें सड़क, बाउंड्रीवॉल, वॉच टावर, पानी की टंकी और अन्य सुविधाओं का निर्माण किया जा रहा है, लेकिन इस प्रोजेक्ट की लागत तक स्पष्ट नहीं है। न तो मौके पर कोई सूचना बोर्ड है और न ही जनता के लिए कोई पारदर्शी जानकारी उपलब्ध कराई गई है।
    जिम्मेदार अधिकारियों के जवाब भी स्थिति को और गंभीर बनाते हैं। वन परिक्षेत्र अधिकारी प्रीतम सिंह नेताम ने कहा कि उनके पास पुराने नेचर कैंप का कोई रिकॉर्ड नहीं है। वहीं सर्किल अधिकारी प्रवीण वर्मा और उपवन मंडल अधिकारी शिवेंद्र सिंह भगत ने भी प्रोजेक्ट की जानकारी से अनभिज्ञता जताई।
    एक ओर पुराना प्रोजेक्ट बिना जवाबदेही के खंडहर बन चुका है, वहीं दूसरी ओर नए प्रोजेक्ट में भी पारदर्शिता का अभाव नजर आ रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या फिर से सरकारी धन इसी तरह बर्बाद होगा, या इस बार जिम्मेदारी तय की जाएगी?
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Brajesh Gupta

Editor, cgnnews24.com

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