हर साल बढ़ते रहे मलेरिया के मरीज, वैज्ञानिक सर्वे नहीं हुआ; अब एनसीडीसी बताएगा आगे का रास्ता
हर साल सैकड़ों लोग मलेरिया की चपेट में, लेकिन समय रहते नहीं हुई वैज्ञानिक निगरानी; अब एनसीडीसी की रिपोर्ट के सहारे बनेगी रणनीति

कवर्धा। कबीरधाम जिले के वनांचल क्षेत्रों में मलेरिया के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्ष 2026 में अब तक 300 से अधिक मलेरिया मरीज मिलने और हाल ही में झलमला सेक्टर में 50 से ज्यादा नए संक्रमित सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) की सक्रियता अचानक बढ़ गई है। अब सुबह 4 बजे टॉर्च, सक्शन ट्यूब और यूवी लाइट ट्रैप लेकर टीमें जंगल और गांवों में मच्छरों की तलाश कर रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि यही वैज्ञानिक निगरानी पहले से की जाती, तो क्या इतने ग्रामीण मलेरिया की चपेट में आते?
एनसीडीसी रायपुर की टीम झलमला सेक्टर के मुड़वाही, सोनवाही, जामुनपानी समेत पांच अति संवेदनशील गांवों में एंटोमोलॉजिकल सर्वे कर रही है। मलेरिया फैलाने वाले एनोफिलीज मच्छरों की प्रजाति, संख्या और उनके व्यवहार का अध्ययन किया जा रहा है। टीम प्रत्येक गांव में मानव आवास, पशु शेड और मिश्रित क्षेत्रों सहित 10 स्थानों से मच्छरों के नमूने एकत्र कर रही है। तैयार रिपोर्ट राज्य और केंद्र सरकार को भेजी जाएगी, जिसके आधार पर आगे की रणनीति तय होगी।
विशेषज्ञों के अनुसार एनोफिलीज मच्छर सुबह 4 से 8 बजे और शाम 6 बजे के बाद सबसे अधिक सक्रिय होते हैं। यही वजह है कि सर्वे भी इन्हीं समयों में किया जा रहा है।
हर साल बढ़ रहे मरीज, फिर भी समय पर नहीं हुई सख्त तैयारी
आंकड़े बताते हैं कि जिले में मलेरिया कोई नई समस्या नहीं है। वर्ष 2025 में 1200, वर्ष 2024 में 1377 और वर्ष 2021 में 850 मरीज मिले थे। वर्ष 2026 के जनवरी से जुलाई तक ही 300 से अधिक मरीज सामने आ चुके हैं। इसके बावजूद संवेदनशील इलाकों में नियमित वैज्ञानिक सर्विलांस, प्रभावी मच्छर नियंत्रण और व्यापक जनजागरूकता अभियान समय पर नहीं चलाए गए।
अब स्वास्थ्य विभाग घर-घर जाकर ब्लड स्लाइड बनाकर रक्त नमूने एकत्र कर रहा है, जिनकी जांच रायपुर स्थित एनसीडीसी प्रयोगशाला में होगी। लेकिन सवाल यह है कि यह पहल पहले क्यों नहीं की गई?
‘मलेरिया मुक्त छत्तीसगढ़’ का दावा, लेकिन जमीनी तस्वीर अलग
सरकार ने वर्ष 2027 तक “मलेरिया मुक्त छत्तीसगढ़” का लक्ष्य रखा है, लेकिन वनांचल क्षेत्रों में हर वर्ष बड़ी संख्या में मरीज सामने आना इस दावे पर सवाल खड़े करता है। यदि संवेदनशील गांवों में पहले से नियमित निगरानी, लार्वा नियंत्रण और जागरूकता अभियान चलते, तो हालात शायद इतने गंभीर नहीं होते।
एनसीडीसी का पक्ष
एनसीडीसी टीम के एंटोमोलॉजिस्ट टी.ए. अरविंद के अनुसार सर्वे की रिपोर्ट राज्य और केंद्र स्तर पर भेजी जाएगी। राष्ट्रीय संस्थानों की तकनीकी सहायता से जिले में मलेरिया नियंत्रण की आगे की रणनीति तैयार की जाएगी।
सबसे बड़ा सवाल
मलेरिया हर साल दस्तक देता है, मरीज बढ़ते हैं और उसके बाद ही तंत्र सक्रिय होता है। आखिर कब स्वास्थ्य विभाग रोकथाम को प्राथमिकता देगा? क्या प्रशासन हर बार मरीजों की संख्या बढ़ने का इंतजार करेगा, या संवेदनशील क्षेत्रों में पहले से ऐसी व्यवस्था करेगा जिससे बीमारी फैलने से पहले ही उस पर प्रभावी रोक लग सके?



