42 सीटें भरीं, क्लास में पहुंचे 32: कवर्धा मेडिकल कॉलेज से 10 छात्रों ने क्यों किया अपग्रेडेशन?
रायपुर-भिलाई-बिलासपुर को चुना; सवाल—क्या शहर और कॉलेज की सुविधाएं छात्रों की पसंद में पीछे पड़ रही हैं?

सीजीएन न्यूज़ | कवर्धा
कवर्धा मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की शुरुआत के साथ ही प्रवेश व्यवस्था का एक दिलचस्प पहलू सामने आया है। नीट काउंसिलिंग के पहले राउंड में स्टेट कोटे की सभी 42 सीटें आवंटित हुईं, लेकिन कक्षाएं शुरू होने तक इनमें से 10 विद्यार्थी अपग्रेडेशन लेकर दूसरे मेडिकल कॉलेजों में चले गए। फिलहाल कवर्धा में 32 विद्यार्थियों ने ज्वाइन किया है।
अपग्रेडेशन लेने वाले विद्यार्थियों ने रायपुर, भिलाई और बिलासपुर के मेडिकल कॉलेजों का रुख किया। काउंसिलिंग की प्रक्रिया में यह सामान्य विकल्प है, लेकिन कवर्धा जैसे नए मेडिकल कॉलेज के लिए यह आंकड़ा कई सवाल जरूर खड़े करता है।
सीट मिली, लेकिन कॉलेज बदलने का विकल्प चुना
नीट काउंसिलिंग में किसी विद्यार्थी को पहले राउंड में जो कॉलेज मिलता है, वह उसे स्वीकार करते हुए अगले राउंड में अपग्रेडेशन के लिए आवेदन कर सकता है। बेहतर पसंद का कॉलेज मिलने पर विद्यार्थी वहां प्रवेश ले सकता है।
कवर्धा में भी 10 विद्यार्थियों ने यही किया। इसलिए केवल इस आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि उन्होंने कवर्धा की व्यवस्था से असंतुष्ट होकर कॉलेज छोड़ा। हालांकि, विद्यार्थियों की पसंद आखिर किन कारणों से बदली, यह जरूर जांच का विषय है।
क्या बड़ा शहर बन रहा है निर्णायक फैक्टर?
रायपुर, भिलाई और बिलासपुर जैसे शहरों में पहले से स्थापित मेडिकल कॉलेज और व्यापक शैक्षणिक सुविधाएं हैं। विद्यार्थियों के लिए कोचिंग, परिवहन, हॉस्टल, पुस्तकालय और अन्य सुविधाएं भी कॉलेज चुनने में भूमिका निभा सकती हैं।
दूसरी ओर कवर्धा मेडिकल कॉलेज अभी अपने शुरुआती चरण में है और इसका स्थायी परिसर निर्माणाधीन है। फिलहाल कक्षाएं और अन्य शैक्षणिक गतिविधियां अस्थायी भवनों से संचालित हो रही हैं।
यही स्थिति एक बड़ा सवाल सामने रखती है—
क्या नए मेडिकल कॉलेज को विद्यार्थियों की पहली पसंद बनाने के लिए केवल सीट और डिग्री पर्याप्त होगी, या आधुनिक शैक्षणिक माहौल और स्थायी सुविधाओं पर भी उतना ही जोर देना होगा?
स्थायी कैंपस कब बनेगा?
शहर से लगे घोठिया क्षेत्र में करीब 40 एकड़ भूमि पर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल का स्थायी परिसर विकसित किया जा रहा है। यहां हॉस्टल, स्टाफ क्वार्टर, लैब, लाइब्रेरी और अन्य सुविधाएं प्रस्तावित हैं।
जब तक स्थायी परिसर पूरी तरह तैयार नहीं होता, विद्यार्थियों को अस्थायी भवनों में पढ़ाई करनी होगी। ऐसे में आने वाले वर्षों में कॉलेज की पहचान और विद्यार्थियों की पसंद काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि स्थायी कैंपस की सुविधाएं कितनी तेजी से विकसित होती हैं।
50 सीटों में अभी 32 छात्र
कवर्धा मेडिकल कॉलेज में कुल 50 एमबीबीएस सीटें हैं। इनमें 42 स्टेट कोटा, 7 ऑल इंडिया कोटा और 1 सेंट्रल गवर्नमेंट कोटा की सीट है।
स्टेट कोटे की 42 सीटों में से 10 विद्यार्थी अपग्रेडेशन ले चुके हैं, जबकि 32 ने कवर्धा में ज्वाइन किया है। खाली हुई सीटों पर अगले काउंसिलिंग राउंड में नए अभ्यर्थियों को मौका मिल सकता है।
कॉलेज प्रबंधन की सफाई—यह सामान्य प्रक्रिया
मेडिकल कॉलेज की डीन डॉ. प्रतिभा जैन शाह के अनुसार, नीट काउंसिलिंग में अपग्रेडेशन सामान्य प्रक्रिया है। विद्यार्थी अपनी मेरिट और पसंद के अनुसार कॉलेज चुनते हैं। अपग्रेडेशन के कारण खाली हुई सीटें आगे की काउंसिलिंग में भर जाएंगी।
अब देखने वाली बात क्या?
कवर्धा मेडिकल कॉलेज के लिए असली परीक्षा केवल 50 सीटें भरने की नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को यहां बनाए रखने और अगले वर्षों में इसे पसंदीदा विकल्प बनाने की होगी।
आने वाले काउंसिलिंग राउंड में कितनी सीटें भरती हैं, कितने विद्यार्थी कवर्धा को अपनी पसंद में रखते हैं और स्थायी कैंपस तैयार होने के बाद विद्यार्थियों की प्रतिक्रिया क्या रहती है—इन आंकड़ों से कॉलेज की वास्तविक स्वीकार्यता की तस्वीर ज्यादा स्पष्ट होगी।
सीजीएन न्यूज़ का सवाल:
क्या कवर्धा मेडिकल कॉलेज को केवल प्रवेश पाने वाला संस्थान नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की पहली पसंद बनाने के लिए सुविधाओं, स्थायी कैंपस और शैक्षणिक माहौल पर अब विशेष फोकस की जरूरत है?





