2015 में चिल्फी में चाय की खेती का ट्रायल, 11 साल बाद भी बागान का इंतजार
70 हेक्टेयर जमीन चिन्हित हुई थी, 15 हेक्टेयर से शुरुआत की थी योजना; अब पुराने प्रयोग पर प्रशासन की नजर क्यों नहीं?

ब्रजेश गुप्ता
सीजीएन न्यूज़ | कवर्धा
कबीरधाम की चिल्फी घाटी में चाय की खेती की संभावना आज की नई खोज नहीं है। करीब 11 साल पहले ही यहां चाय की खेती का परीक्षण किया जा चुका था। वर्ष 2015 में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया था कि वन विभाग ने चिल्फी घाटी में करीब 70 हेक्टेयर भूमि चिन्हित की थी और शुरुआती तौर पर 15 हेक्टेयर में चाय की खेती करने की योजना बनाई गई थी। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट था कि क्षेत्र में चाय की खेती का ट्रायल पहले ही किया जा चुका था।
यानी वर्ष 2015 में जिस संभावना को लेकर प्रयोग शुरू किया गया था, वह आज करीब 11 साल बाद भी बड़े स्तर की नियमित चाय खेती में तब्दील नहीं हो सकी। अब एक बार फिर चिल्फी में चाय की खेती को लेकर पायलट प्रोजेक्ट की बात सामने आई है। 2025 में प्रकाशित जानकारी में भी 70 हेक्टेयर भूमि चिन्हित करने, 15 हेक्टेयर से शुरुआत और पहले परीक्षण किए जाने का उल्लेख मिलता है।
पहले ट्रायल हुआ, फिर मामला कहां अटक गया?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब चिल्फी की जलवायु को चाय के लिए अनुकूल मानकर वर्षों पहले प्रयोग किया गया था, तो उसके बाद इस दिशा में लगातार काम क्यों नहीं हुआ?
क्या पुराने प्रयोग के परिणाम संतोषजनक नहीं रहे?
क्या पौधों की देखभाल और सिंचाई की व्यवस्था नहीं बन पाई?
क्या चाय की पत्तियों के प्रसंस्करण के लिए सुविधा उपलब्ध नहीं हुई?
क्या किसानों को तकनीकी और आर्थिक सहायता नहीं मिल पाई?
या फिर चाय की बिक्री और बाजार की व्यवस्था नहीं होने के कारण योजना आगे नहीं बढ़ सकी?
इन सवालों का जवाब अब प्रशासन और वन विभाग को देना चाहिए।
जशपुर का अनुभव भी बताता है कि सिर्फ पौधे लगाना काफी नहीं
छत्तीसगढ़ में चाय की खेती का जशपुर मॉडल भी सामने है। वहां वन विभाग ने 2011 में चाय की खेती शुरू की थी, लेकिन प्रसंस्करण सुविधा नहीं होने के कारण एक बागान 2017 तक बंद रहा। बाद में इसे दोबारा शुरू किया गया।
इससे यह साफ होता है कि चाय की खेती के लिए पौधे लगाने के साथ सिंचाई, देखभाल, तुड़ाई, प्रसंस्करण और बाजार की व्यवस्था भी जरूरी है।
11 साल बाद फिर 70 हेक्टेयर की बात
अब 2025 में सामने आई योजना में चिल्फी में करीब 70 हेक्टेयर भूमि चिन्हित कर शुरुआती 15 हेक्टेयर में चाय की खेती करने की बात कही गई है। 24 किसानों द्वारा करीब 26 एकड़ में चाय उगाने और बैगा समुदाय की भागीदारी का भी उल्लेख है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है—जब 2015 में ही ट्रायल हो चुका था, तो उस प्रयोग की विस्तृत रिपोर्ट कहां है?
उस समय लगाए गए पौधों की स्थिति क्या रही?
कितना उत्पादन मिला?
कितने पौधे जीवित रहे?
कितने किसानों को जोड़ा गया?
और यदि प्रयोग सफल था तो इसे आगे क्यों नहीं बढ़ाया गया?
चिल्फी के लिए बड़ा अवसर, लेकिन पुराने प्रयोग की समीक्षा जरूरी
चिल्फी की ठंडी पहाड़ी जलवायु और प्राकृतिक वातावरण इसे चाय की खेती के परीक्षण के लिए संभावनाशील क्षेत्र बनाते हैं। यदि यहां चाय की खेती वास्तव में सफल होती है तो इससे स्थानीय किसानों, आदिवासी समुदाय और पर्यटन को भी फायदा मिल सकता है।
लेकिन 11 साल पुराने प्रयोग को नजरअंदाज करके नई शुरुआत करना कितना प्रभावी होगा, यह बड़ा सवाल है।
प्रशासन को सबसे पहले पुराने ट्रायल की समीक्षा करनी चाहिए और उसकी सफलता-असफलता के कारण सार्वजनिक करने चाहिए। इसके बाद ही यह तय होना चाहिए कि चिल्फी में चाय की खेती को किस मॉडल पर आगे बढ़ाया जाए।
अब प्रशासन से ये सवाल
2015 में हुए चाय खेती के ट्रायल का क्या हुआ?
कितनी जमीन पर पौधे लगाए गए थे?
कितना उत्पादन मिला था?
बागान वर्तमान में किस स्थिति में है?
बीच के वर्षों में इसकी देखरेख किस विभाग की जिम्मेदारी थी?
यदि प्रयोग सफल था तो इसे लगातार क्यों नहीं बढ़ाया गया?
अब 2025 की योजना में पुरानी कमियों को दूर करने के लिए क्या व्यवस्था की गई है?
चिल्फी में चाय की खेती की कहानी सिर्फ एक नई कृषि संभावना की कहानी नहीं है। यह करीब 11 साल पुराने एक प्रयोग और उसके बाद हुई कथित उपेक्षा की भी कहानी है। अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन पुराने प्रयोग की फाइल खोले और बताए कि चिल्फी में चाय की खेती का सपना आखिर इतने वर्षों तक जमीन पर क्यों नहीं उतर सका।




