
कवर्धा । रेंगाखार
वन परिक्षेत्र रेंगाखार के गोपीखार बांध के पास करोड़ों रुपए की लागत से बन रहे रिजॉर्ट के निर्माण कार्य में गंभीर लापरवाही सामने आ रही है। निर्माण स्थल पर घटिया सामग्री के उपयोग और निगरानी की कमी को लेकर स्थानीय स्तर पर सवाल उठने लगे हैं।
जानकारी के अनुसार, निर्माण में मिट्टी युक्त रेत और जीरा डस्ट वाली गिट्टी का उपयोग किया जा रहा है, जो मानक निर्माण सामग्री के अनुरूप नहीं मानी जाती। इसके बावजूद फाउंडेशन का काम लगातार जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर नींव पर खड़ा ढांचा लंबे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकता और भविष्य में किसी बड़े हादसे का कारण बन सकता है।
इस परियोजना में दो रिजॉर्ट भवन, लगभग 360 मीटर लंबी परिधि दीवार, पहुंच मार्ग, बोर खनन, वॉच टावर, पानी की टंकी और नाव खरीद जैसे कार्य शामिल हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, निर्माण कार्य करीब दो वर्षों से चल रहा है, लेकिन अब तक इसकी कुल लागत और प्रगति को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।
सूचना बोर्ड तक नहीं, नियमों की अनदेखी
निर्माण स्थल पर अनिवार्य सूचना बोर्ड तक नहीं लगाया गया है। ऐसे बोर्ड पर आमतौर पर परियोजना की लागत, स्वीकृत कार्य, ठेकेदार और संबंधित विभाग की जानकारी प्रदर्शित की जाती है, लेकिन यहां इसकी पूरी तरह अनदेखी की गई है। इससे पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
ठेकेदार के पुराने काम भी रहे विवादित
स्थानीय स्तर पर यह भी सामने आया है कि जिस ठेकेदार को यह काम दिया गया है, उसके खिलाफ पहले भी घटिया निर्माण के मामले सामने आ चुके हैं। वर्ष 2023 में बनाए गए एक स्टाफ डेम के पहली ही बारिश में क्षतिग्रस्त होने और एक सीसी रोड के उखड़ने की घटनाएं सामने आई थीं। इसके बावजूद उसी ठेकेदार को दोबारा काम दिए जाने से प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।
अधिकारियों ने दी जांच की बात
मामले में संबंधित अधिकारियों से संपर्क करने पर स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी। हालांकि, उपवन मंडल स्तर के अधिकारी ने माना कि साइट पर सूचना बोर्ड नहीं लगाया गया है और निर्माण गुणवत्ता को लेकर जांच कराने की बात कही है।
विशेषज्ञों की चेतावनी
सिविल इंजीनियरों का कहना है कि किसी भी भवन की मजबूती उसकी नींव पर निर्भर करती है। यदि निर्माण में मानक सामग्री और सही अनुपात का उपयोग नहीं किया गया, तो संरचना में कुछ ही वर्षों में दरारें, झुकाव या अन्य गंभीर क्षति आ सकती है।
इस पूरे मामले ने निर्माण की गुणवत्ता, निगरानी व्यवस्था और विभागीय जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।




