बाहपानी में सरकारी तंत्र नाकाम, बैगा परिवारों ने खुद खोदा जीवन का कुआं

कवर्धा।
तपती गर्मी, सूखते जलस्रोत और प्रशासनिक उदासीनता के बीच पंडरिया ब्लॉक के दूरस्थ वनांचल गांव बाहपानी से एक मिसाल सामने आई है। यहां रहने वाले बैगा परिवारों ने पानी की किल्लत से हार मानने के बजाय खुद समाधान खोज लिया। पिछले 12 दिनों से ग्रामीण लगातार श्रमदान कर एक झिरिया (प्राकृतिक जलस्रोत) को कुएं में बदलने में जुटे हैं।
ग्राम पंचायत कांदावानी के आश्रित गांव बाहपानी में पहले एक छोटा झिरिया था, जिसमें केवल निस्तारी योग्य पानी उपलब्ध होता था। अब ग्रामीणों ने उसी झिरिया को गहरा कर स्थायी जलस्रोत बनाने का बीड़ा उठाया है। काफी खुदाई हो चुकी है और लक्ष्य इसे इतना गहरा करना है कि सालभर पेयजल उपलब्ध हो सके। ग्रामीणों का मानना है कि कुछ दिनों में जब पानी भरना शुरू होगा, तो वह स्वतः साफ होकर पीने योग्य बन जाएगा। इस पहल से गांव की 150 से अधिक आबादी को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है।
गांव के विसलू बैगा (46) बताते हैं कि हर साल गर्मियों में पानी का संकट झेलना उनकी मजबूरी रही है। “हम बचपन से झिरिया के पानी पर निर्भर हैं, लेकिन कभी स्थायी समाधान नहीं मिला,” उन्होंने कहा।
इस अभियान की खास बात महिलाओं की सक्रिय भागीदारी है। रोजाना 25 से 30 ग्रामीण, जिनमें पुरुषों के साथ महिलाएं भी शामिल हैं, बारी-बारी से श्रमदान कर रहे हैं। सुंदरी बाई, कटोरी बाई, जेठिया बाई और सोनमतिया बाई जैसी महिलाएं इस बदलाव की अगुआ बनकर सामने आई हैं।
गांव में आंगनबाड़ी के पास लगा सोलर पंप ही पेयजल का एकमात्र साधन था, लेकिन मोटर खराब होने से पानी की आपूर्ति ठप हो गई। क्षेत्र की जटिल भौगोलिक स्थिति के कारण बोरवेल भी सफल नहीं हो पाए। ऐसे में जब सभी विकल्प खत्म हो गए, तो ग्रामीणों ने खुद ही रास्ता निकालने का फैसला किया।
बिना किसी सरकारी मदद के शुरू हुआ यह श्रमदान अब पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन गया है। बाहपानी के ग्रामीणों ने यह साबित कर दिया है कि सामूहिक प्रयास और दृढ़ इच्छाशक्ति से किसी भी समस्या का समाधान संभव है।





