भोरमदेव में तेंदुए को गांव पहुंचने से पहले रोकने की तैयारी, 610 हेक्टेयर में बन रहे घास मैदान

सी जी एन न्यूज़ | कवर्धा
भोरमदेव अभयारण्य से लगे गांवों में तेंदुए की आवाजाही लगातार वन विभाग के लिए चुनौती बनी हुई है। गांवों में तेंदुआ पहुंचने के बाद उसे रेस्क्यू करने के बजाय अब विभाग जंगल के भीतर ही ऐसी व्यवस्था तैयार कर रहा है, जिससे वन्यजीवों को भोजन की तलाश में गांवों की ओर आने की जरूरत न पड़े।
इसी कड़ी में भोरमदेव अभयारण्य के अलग-अलग हिस्सों में 610 हेक्टेयर क्षेत्र में घास मैदान विकसित किए जा रहे हैं। इस काम पर करीब 40 लाख रुपए खर्च किए जा रहे हैं। जामुनपानी, महराजपुरडीह समेत 12 से अधिक स्थानों पर चारागाह तैयार किए जा रहे हैं।
घास बढ़ेगी तो शिकार जंगल में रहेगा
वन विभाग का पूरा फोकस तेंदुए को सीधे पकड़ने पर नहीं, बल्कि उसके शिकार को जंगल में रोकने पर है। हिरण, चीतल, सांभर, गौर और कोटरी जैसे शाकाहारी वन्यजीवों को जंगल में पर्याप्त भोजन मिलेगा तो इनके गांव और खेतों की ओर जाने की संभावना कम होगी।
वन अधिकारियों के मुताबिक यही वन्यजीव तेंदुए जैसे मांसाहारी जानवरों का प्रमुख शिकार हैं। ऐसे में शाकाहारी वन्यजीव जंगल में रहेंगे तो तेंदुए के भी शिकार की तलाश में गांवों के आसपास आने की संभावना कम होगी।
29 गांव जंगल के बेहद करीब
भोरमदेव अभयारण्य से लगे 29 गांव ऐसे हैं, जो जंगल की सीमा से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर बसे हैं। खेत और जंगल के बीच ज्यादा दूरी नहीं होने के कारण वन्यजीवों की आवाजाही कई बार आबादी वाले इलाकों तक पहुंच जाती है।
इसी क्षेत्र में तेंदुए समेत दूसरे वन्यजीवों की मौजूदगी भी सामने आती रहती है। रेंगाखार क्षेत्र में तेंदुए अक्सर दिखाई देते हैं।
अभयारण्य में 50 से 70 तेंदुए
वन विभाग के अनुसार भोरमदेव अभयारण्य में करीब 50 से 70 तेंदुए हैं। इसके अलावा यहां भालू, लकड़बग्घा, नीलगाय, जंगली कुत्ता, गौर, भेड़िया, जंगली बिल्ली, लोमड़ी, चीतल, सांभर, कोटरी और अन्य वन्यजीव भी मौजूद हैं। समय-समय पर बाघ की मौजूदगी के संकेत भी मिलते रहे हैं।
पहले रेस्क्यू, अब रोकथाम पर जोर
अब तक गांव में तेंदुआ या दूसरा वन्यजीव दिखाई देने के बाद वन विभाग की टीम रेस्क्यू के लिए पहुंचती थी। कई बार वन्यजीव को पकड़कर वापस जंगल में छोड़ना पड़ता था।
अब विभाग की कोशिश है कि ऐसी स्थिति ही कम बने। जंगल के भीतर भोजन उपलब्ध कराने के लिए चारागाह तैयार किए जा रहे हैं, ताकि वन्यजीव जंगल में ही रहें और गांव की ओर उनका मूवमेंट कम हो।
नंबरों में भोरमदेव
352 वर्ग किमी — अभयारण्य का कुल क्षेत्रफल
160 वर्ग किमी — कोर क्षेत्र
192 वर्ग किमी — बफर क्षेत्र
610 हेक्टेयर — चारागाह विकास का क्षेत्र
40 लाख रुपए — चारागाह विकास की अनुमानित लागत
29 गांव — अभयारण्य से जुड़े गांव
50–70 — विभाग के अनुसार तेंदुओं की अनुमानित संख्या
अभयारण्य की अधीक्षक अनिता साहू ने बताया कि जंगल में भोजन की उपलब्धता कम होने से शाकाहारी वन्यजीव गांवों की ओर जा सकते हैं। इससे उनकी शिकार की तलाश में मांसाहारी वन्यजीव भी आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुंच सकते हैं। इसी वजह से जंगल के भीतर चारागाह विकसित किए जा रहे हैं।




