
सीजी एन न्यूज़ | कवर्धा ! ब्रजेश गुप्ता
जुनवानी रोड स्थित न्यू हाईटेक बस स्टैंड की शिफ्टिंग की तैयारी चल रही है। शहर से करीब 2 किलोमीटर दूर नए बस स्टैंड तक आम लोगों की आवाजाही के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट बेहद जरूरी है। लेकिन जैसे ही न्यू हाईटेक बस स्टैंड में कदम रखते हैं, नगर प्रशासन की लापरवाही और सिस्टम की विफलता साफ नजर आने लगती है।
धूल से सनी खड़ी सिटी बसें, टूटे शीशे, उखड़ी हुई सीटें और खाली इंजन कम्पार्टमेंट… ये वही बसें हैं जिन्हें साल 2015 में कवर्धा के लोगों को सस्ता, सुरक्षित और सुगम सफर देने के उद्देश्य से खरीदा गया था। आज ये बसें पिछले 8 वर्षों से कभी स्वर्ण जयंती परिसर तो कभी न्यू बस स्टैंड में यूं ही खड़ी-खड़ी कबाड़ में तब्दील हो चुकी हैं।
पहिए, बैटरी और इंजन तक चोरी
न्यू बस स्टैंड में खड़ी चारों सिटी बसों की हालत बेहद खराब है। सभी बसों के दरवाजे टूट चुके हैं, सीटें उखड़कर गायब हैं और पहिए, बैटरियां व इंजन तक चोरी हो चुके हैं। लगभग यही स्थिति घुघरी कला रोड स्थित सिटी बस टर्मिनल (डिपो) में खड़ी बसों की भी है। जिन बसों से जनता को फायदा मिलना था, वे अब सिर्फ जंग लगा ढांचा बनकर खड़ी हैं।
नगर पालिका के सीएमओ रोहित साहू का कहना है कि नए बस स्टैंड की शिफ्टिंग के बाद सिटी बसों के संचालन को लेकर पहल की जाएगी। लेकिन सवाल यह है कि जिन बसों का अस्तित्व ही अब लगभग खत्म हो चुका है, उन्हें कैसे फिर से सड़क पर उतारा जाएगा?
करोड़ों का डिपो भी अनुपयोगी
वर्ष 2015 में सिटी बसों के संचालन के लिए घुघरी कला में सिटी बस टर्मिनल (डिपो) का निर्माण कराया गया था। इस टर्मिनल पर करीब 1 करोड़ रुपए खर्च किए गए। आज यह डिपो भी बदहाली का शिकार है। पहुंच मार्ग जर्जर हो चुका है, परिसर सुनसान पड़ा है और बसें कबाड़ बनकर खड़ी हैं।
रिपेयरिंग भी अब आसान नहीं
कवर्धा में मौजूद 10 में से 8 सिटी बसों की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि उनकी मरम्मत भी आसान नहीं लगती। कोरोना काल में शासन द्वारा ढाई साल का टैक्स माफ किया गया था, लेकिन अब रिपेयरिंग, परमिट और इंश्योरेंस का भारी खर्च सामने है। पूर्व में नगर पालिका ने सिटी बसों की मरम्मत के लिए राजनांदगांव अर्बन सोसायटी को प्रस्ताव भेजा था, लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं मिला।
5 रुपए का सफर बंद, 30 रुपए देने को मजबूर यात्री
सिटी बसों का संचालन बंद होने से आम जनता की परेशानी कई गुना बढ़ गई है। बस स्टैंड से जिला अस्पताल तक का सफर, जो पहले सिटी बस से सिर्फ 5 रुपए में हो जाता था, अब ई-रिक्शा या ऑटो से 25 से 30 रुपए में तय करना पड़ रहा है।
छात्रों और नौकरीपेशा लोगों के लिए रोजाना आने-जाने का खर्च कई गुना बढ़ गया है। कवर्धा से पिपरिया, बोड़ला या पोंडी जाने के लिए जहां पहले सिटी बस का किराया 10 रुपए था, अब यात्रियों को 25 से 30 रुपए चुकाने पड़ रहे हैं।
कोरोना के बाद किसी ने नहीं ली सुध
सितंबर 2015 में तत्कालीन सरकार ने कवर्धा को 10 सिटी बसें उपलब्ध कराई थीं। 40-40 सीटर इन बसों पर करीब 4 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। इनका संचालन राजनांदगांव शहरी सार्वजनिक यातायात सोसायटी के तहत टेंडर के माध्यम से किया गया। शुरुआत में बसें 10 रूटों पर चलीं, लेकिन सवारी कम मिलने का हवाला देकर ऑपरेटर ने धीरे-धीरे संचालन बंद कर दिया। कोरोना काल के दौरान बसें पूरी तरह खड़ी हो गईं।
इसके बाद न नगर पालिका ने कोई ठोस कदम उठाया, न जिला प्रशासन ने और न ही बस ऑपरेटर ने इसमें रुचि दिखाई। नतीजा यह हुआ कि करोड़ों की सार्वजनिक संपत्ति आज कबाड़ में तब्दील हो चुकी है और आम जनता सस्ती परिवहन सुविधा से वंचित है।
सवाल यही है — क्या जिम्मेदारों से कभी इस लापरवाही का जवाब मांगा जाएगा?





