कवर्धा का गौरवशाली इतिहास: 1751 में स्थापित हुई थी रियासत, नागवंशी राजाओं से लेकर कबीरपंथ तक रही ऐतिहासिक पहचान
भोरमदेव मंदिर, राजशाही परंपरा और संत कबीर की विरासत ने कवर्धा को दी अलग पहचान

सीजीएन न्यूज़ | कवर्धा। बृजेश गुप्ता
कवर्धा। छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले का मुख्यालय कवर्धा केवल एक शहर नहीं, बल्कि सदियों पुराने इतिहास, राजशाही परंपरा, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां का इतिहास प्राचीन नागवंशी शासकों से लेकर कवर्धा रियासत और संत कबीर की परंपरा तक फैला हुआ है। भोरमदेव मंदिर की ऐतिहासिक स्थापत्य कला और कबीरपंथ की गुरु परंपरा ने इस क्षेत्र को प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर में एक अलग पहचान दिलाई है।
1751 में हुई थी कवर्धा रियासत की स्थापना
कवर्धा के राजनीतिक इतिहास में वर्ष 1751 का विशेष महत्व है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार इसी वर्ष महाबली सिंह ने कवर्धा रियासत की स्थापना की थी। इसके बाद लंबे समय तक यहां राजपरिवार का शासन रहा। ब्रिटिश शासनकाल में भी कवर्धा एक रियासत के रूप में अपनी अलग पहचान रखता था। आजादी के बाद रियासतों के भारतीय संघ में विलय के दौरान कवर्धा भी भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बना।
नागवंशी शासकों से जुड़ा है प्राचीन इतिहास
कवर्धा और आसपास के क्षेत्रों का इतिहास प्राचीन नागवंशी तथा फणिनागवंशी शासकों से जुड़ा हुआ है। भोरमदेव क्षेत्र में आज भी प्राचीन मंदिरों और स्थापत्य कला के अवशेष उस दौर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की कहानी बयां करते हैं। पुरातात्विक दृष्टि से यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों में गिना जाता है।
भोरमदेव मंदिर ने दिलाई अंतरराष्ट्रीय पहचान
कवर्धा से लगभग 18 किलोमीटर दूर स्थित भोरमदेव मंदिर जिले की सबसे बड़ी ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर की स्थापत्य कला, पत्थरों पर उकेरी गई कलात्मक मूर्तियां और प्राचीन निर्माण शैली इसे विशिष्ट बनाती हैं। इसकी सुंदर वास्तुकला के कारण इसे छत्तीसगढ़ का खजुराहो भी कहा जाता है। मंदिर परिसर के साथ मड़वा महल और आसपास के अन्य ऐतिहासिक स्थल भी क्षेत्र के गौरवशाली अतीत की याद दिलाते हैं।
संत कबीर की परंपरा से जुड़ा कबीरधाम
कवर्धा की पहचान केवल राजशाही इतिहास तक सीमित नहीं है। संत कबीर और कबीरपंथ की धार्मिक परंपरा का भी इस क्षेत्र से गहरा संबंध रहा है। ऐतिहासिक विवरणों में वर्ष 1806 में कवर्धा में कबीरपंथ की गुरु गद्दी स्थापित होने का उल्लेख मिलता है। इसी धार्मिक और आध्यात्मिक विरासत के कारण इस क्षेत्र को कबीरधाम नाम मिला।
1998 में बना नया जिला, 2003 में मिला कबीरधाम नाम
प्रशासनिक इतिहास में 6 जुलाई 1998 महत्वपूर्ण तारीख है। इसी दिन कवर्धा को राजनांदगांव जिले से अलग कर स्वतंत्र जिला बनाया गया था। बाद में 10 मार्च 2003 को जिले का नाम बदलकर कबीरधाम कर दिया गया। वर्तमान में कवर्धा इस जिले का मुख्यालय है।
इतिहास को सहेजने की जरूरत
इतिहास, संस्कृति और पर्यटन की दृष्टि से कबीरधाम जिला अपार संभावनाएं रखता है। भोरमदेव मंदिर, पचराही, मड़वा महल, कवर्धा की रियासती विरासत और कबीरपंथ की परंपरा को व्यवस्थित रूप से संरक्षित और प्रचारित करने की जरूरत है। स्थानीय इतिहास से जुड़े पुराने दस्तावेजों, राजपरिवार के अभिलेखों और पुरातात्विक स्थलों पर व्यापक शोध होने से कवर्धा के इतिहास के कई अनछुए पहलू सामने आ सकते हैं।
कवर्धा का इतिहास केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी पहचान, संस्कृति और गौरव को जानने का महत्वपूर्ण माध्यम है।



