पहाड़ों के बीच छिपा इतिहास — सिली पचराही की अनकही कहानी

बोड़ला (कवर्धा):brajesh gupta
कवर्धा से लगभग 47 किलोमीटर दूर, पहाड़ों के बीच बसा सिली पचराही गांव आज भले ही शांत और साधारण नजर आता हो, लेकिन इसके भीतर सदियों पुराना समृद्ध इतिहास दफन है। ग्राम पंचायत बोदा-3 के अंतर्गत आने वाला यह छोटा सा गांव कभी एक बड़ा व्यापारिक केंद्र हुआ करता था।
स्थानीय मान्यताओं और पुरातात्विक खोजों के अनुसार, सिली पचराही से होकर रतनपुर, मुंगेली, दुर्ग, रायपुर और जबलपुर जैसे प्रमुख स्थानों को जोड़ने वाले मार्ग गुजरते थे। यहां के बाजार में बस्तर क्षेत्र की चिरौंजी, महुआ और अन्य दुर्लभ वस्तुओं का व्यापार होता था, जिससे यह क्षेत्र आर्थिक रूप से काफी समृद्ध था।
साल 2007 में जब यहां खुदाई शुरू हुई, तो सिली पचराही ने अपने रहस्यों से पर्दा उठाना शुरू किया। कंकालिन टीला से प्राचीन इमारतों के अवशेष, व्यवस्थित स्नानागार, आदिम युग के हथियार, बर्तन और मिट्टी के आभूषण मिले। यह संकेत देते हैं कि यह क्षेत्र एक विकसित और संगठित सभ्यता का हिस्सा रहा है।
खुदाई में यहां प्राचीन मंदिरों के अवशेष भी सामने आए हैं। विशेष रूप से शिव मंदिर को स्थानीय लोग भोरमदेव मंदिर जितना ही प्राचीन मानते हैं, जो इस क्षेत्र की धार्मिक आस्था को दर्शाता है।
इतिहास की धरोहर के रूप में यहां से करीब 1000 साल पुरानी स्वर्ण मुद्राएं भी प्राप्त हुई हैं। इसके साथ ही 65 से अधिक चांदी और तांबे के सिक्के मिले हैं, जो इस क्षेत्र के प्राचीन व्यापारिक वैभव के प्रमाण हैं।
सिली पचराही केवल ऐतिहासिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था का भी प्रमुख केंद्र है। पास के बकेला गांव में भगवान पार्श्वनाथ की लगभग 1200 साल पुरानी प्रतिमा स्थापित है, जो जैन धर्म की गहरी उपस्थिति को दर्शाती है। इसके अलावा यहां प्रागैतिहासिक जीवाश्म भी मिले हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीनता को और भी गहरा बनाते हैं।
गांव की प्रमुख जानकारी:
आबादी: लगभग 710 (ग्राम पंचायत बोदा-3)
दूरी: जिला मुख्यालय कवर्धा से 47 किमी
साक्षरता दर: 40%
प्रमुख स्थल: प्राचीन शिव मंदिर, कंकालिन टीला, हनुमान मंदिर, जैन तीर्थ बकेला
आज जरूरत है कि सिली पचराही जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित और विकसित किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस गौरवशाली अतीत को जान सकें।



