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सहारा रिफंड पोर्टल फेल: करोड़ों मजदूर-किसानों की गाढ़ी कमाई डिजिटल जाल में फँसी

ब्रजेश गुप्ता  विशेष रिपोर्ट
कवर्धा/पांडातराई/पंडरिया/पिपरिया (छत्तीसगढ़) |
देशभर में सहारा इंडिया के लाखों निवेशक आज अपनी ही जमा पूंजी के लिए भटक रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सेबी द्वारा ट्रांसफर किए गए ₹5000 करोड़ से बने CRCS सहारा रिफंड पोर्टल से उम्मीद थी कि पीड़ित जमाकर्ताओं को राहत मिलेगी, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। छत्तीसगढ़ के कवर्धा, पांडातराई, पंडरिया और पिपरिया सहित पूरे देश से आ रही शिकायतें बता रही हैं कि यह पोर्टल अब एक डिजिटल बाधा बन चुका है।
“पैसा है, लेकिन रास्ता बंद है”
निवेशकों का कहना है कि उन्होंने महीनों पहले आवेदन कर दिए, लेकिन न तो भुगतान मिला, न ही कोई स्पष्ट स्टेटस। कई लोगों की फाइलें बार-बार “डाटा मिसमैच” या “इनवैलिड डॉक्यूमेंट” बताकर रिजेक्ट की जा रही हैं।
समस्या की जड़ यह है कि—
आधार, बैंक खाता, नाम या स्कीम का थोड़ा सा भी फर्क होने पर आवेदन खारिज हो जाता है
सहारा की पुरानी रसीदों का डिजिटल रिकॉर्ड से मेल नहीं बैठता
सर्वर बार-बार डाउन रहता है
न कोई स्थानीय हेल्पडेस्क है, न कोई शिकायत निवारण व्यवस्था
ग्रामीण इलाकों के बुजुर्ग, विधवाएँ और मजदूर, जिनके पास न स्मार्टफोन है और न ही डिजिटल ज्ञान, सबसे ज्यादा पीड़ित हैं।
₹80,000 करोड़ का बकाया, लेकिन सिर्फ ₹5000 करोड़ जारी
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सहारा समूह पर निवेशकों का कुल बकाया ₹80,000 करोड़ से अधिक है, जबकि सरकार ने फिलहाल सिर्फ ₹5000 करोड़ जारी किए हैं। इसी वजह से भुगतान को धीमा रखा जा रहा है ताकि आगे और राशि देने का दबाव न बने।
एक सामाजिक कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया,
“अगर सभी लोगों को तेज़ी से पैसा मिल गया तो सरकार पर बाकी रकम निकालने का दबाव आ जाएगा। इसलिए सिस्टम को जानबूझकर जटिल बनाया गया है।”
डिजिटल पोर्टल बना “फिल्टर”
आरोप है कि ऑनलाइन व्यवस्था को एक तरह के फ़िल्टर की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि अशिक्षित, ग्रामीण और कमजोर दस्तावेज़ वाले निवेशक अपने-आप बाहर हो जाएँ और दावा करने वालों की संख्या कम रह जाए।
स्थानीय काउंटर से भुगतान की मांग तेज
देशभर के सहारा पीड़ित संगठन अब मांग कर रहे हैं कि—
“जिस काउंटर पर निवेश लिया गया था, उसी शाखा से फिजिकल वेरिफिकेशन कर सीधे भुगतान किया जाए।”
उनका कहना है कि इससे न केवल प्रक्रिया तेज़ होगी, बल्कि पारदर्शिता भी आएगी और फर्जीवाड़े व तकनीकी अड़चनों से बचा जा सकेगा।
राजनीतिक दबाव के बिना समाधान नहीं
विश्लेषकों के अनुसार यह अब केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। सहारा की ज़मीन, होटल और विदेशी संपत्तियाँ बेचकर ही बाकी पैसा निकलेगा, जो राजनीतिक रूप से संवेदनशील है। इसलिए सरकार टालमटोल की नीति अपना रही है।
निवेशकों की चेतावनी
कवर्धा और आसपास के इलाकों के पीड़ित निवेशकों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द समाधान नहीं हुआ तो वे सामूहिक रूप से ज्ञापन, आरटीआई और आंदोलन का रास्ता अपनाएँगे।
एक बुजुर्ग निवेशक के शब्दों में—
“यह कोई भीख नहीं, हमारी ज़िंदगी भर की कमाई है। हमें हमारा हक़ चाहिए।”

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Brajesh Gupta

Editor, cgnnews24.com

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