कबीरधाम के जंगलों में हर बाघ-तेंदुए की बनेगी डीएनए कुंडली
ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन-2026 के तहत पहले चरण का सर्वे शुरू

ब्रजेश गुप्ता
कबीरधाम (कवर्धा) के घने जंगलों में अब बाघ और तेंदुओं की पहचान सिर्फ कैमरे या पैरों के निशानों से नहीं, बल्कि डीएनए प्रोफाइल के आधार पर की जाएगी। ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन-2026 के अंतर्गत यहां पहले चरण का वैज्ञानिक सर्वे शुरू हो गया है, जो देश के वन्यजीव संरक्षण इतिहास में एक बड़ी पहल मानी जा रही है।
इस सर्वे का सबसे बड़ा फोकस बाघ और तेंदुए के डीएनए सैंपल एकत्र करने पर है। जंगल में मिलने वाले मल, बाल और अन्य जैविक अवशेषों को वैज्ञानिक तरीके से संग्रहित किया जाएगा। इन सैंपलों की जांच से हर बाघ और तेंदुए की अलग पहचान तय होगी। इससे यह भी साफ पता चल सकेगा कि कौन-सा बाघ किस इलाके में घूमता है और उसका क्षेत्र कितना फैला है।
इस तकनीक से एक ही जानवर की बार-बार गिनती जैसी पुरानी गलती अब पूरी तरह खत्म हो जाएगी।
एम-स्ट्राइप एप से होगा डिजिटल रिकॉर्ड
इस सर्वे में एम-स्ट्राइप ईकोलॉजिकल मोबाइल एप का इस्तेमाल किया जा रहा है। मौके पर ही जियो-टैग फोटो, लोकेशन और अन्य जरूरी जानकारियां डिजिटल रूप से दर्ज की जा रही हैं। यह पूरा डेटा कवर्धा से दुर्ग वन वृत्त भेजा जाएगा, जहां से आगे इसे देहरादून में वैज्ञानिक विश्लेषण के लिए भेजा जाएगा।
165 बीटों में 400 से ज्यादा कर्मी तैनात
कवर्धा वनमंडल की 165 बीटों में यह सर्वे किया जा रहा है। हर बीट में तीन सदस्यीय टीम बनाई गई है, जिसमें एक बीट प्रभारी और दो सहयोगी शामिल हैं। इस तरह कुल 400 से अधिक कर्मचारी इस मिशन में जुटे हैं। चार दिन पहले सभी को विशेष प्रशिक्षण दिया गया था। इसके साथ ही पर्यावरण प्रेमी और इच्छुक छात्र भी इस अभियान में भाग ले रहे हैं।
तीन दिन का साइंस-आधारित फील्ड सर्वे
पहले तीन दिन अलग-अलग रूटों पर 5 किलोमीटर के दायरे में मांसाहारी और बड़े शाकाहारी वन्यप्राणियों का वैज्ञानिक सर्वे किया जा रहा है। इस दौरान बाघ और तेंदुए के पगमार्क, स्क्रैच मार्क, मूवमेंट संकेत और डीएनए सैंपल की लोकेशन दर्ज की जाती है।
हर बीट में 2 किलोमीटर का लाइन ट्रांजेक्ट भी तय किया गया है, जहां छोटे शाकाहारी जीवों की उपस्थिति, पेड़ों की संख्या, घास की प्रजातियां और जंगल में मानवीय दबाव (ह्यूमन डिस्टर्बेंस) का भी आंकलन किया जा रहा है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि जंगल बाघ-तेंदुए के लिए कितना सुरक्षित और अनुकूल है।
पूरी आहार श्रृंखला की भी बनेगी तस्वीर
यह सर्वे सिर्फ बाघ और तेंदुओं तक सीमित नहीं है। जिन शाकाहारी जीवों पर ये निर्भर रहते हैं — जैसे हिरण, चीतल और अन्य वन्यप्राणी — उनकी भी गणना की जा रही है। साथ ही जंगल में मौजूद पेड़ और घास की प्रजातियों का भी रिकॉर्ड तैयार हो रहा है। इससे पूरी आहार श्रृंखला (फूड चेन) की वैज्ञानिक तस्वीर सामने आएगी।
इस विस्तृत सर्वे से यह स्पष्ट हो सकेगा कि कबीरधाम के जंगल बड़े मांसाहारी जीवों के लिए कितने सुरक्षित हैं और भविष्य में संरक्षण के लिए किन कदमों की जरूरत होगी।




