जन-मन आवास योजना पर बड़ा सवाल 2 लाख पूरे, फिर भी जानलेवा घर: चिल्फी घाटी में बैगा परिवारों के साथ सरकारी धोखा
चिल्फी घाटी (कबीरधाम जिला) से विशेष खोजी रिपोर्ट

कवर्धा, चिल्फ़ी घाटी-:
जिस प्रधानमंत्री जन-मन आवास योजना को विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा परिवारों के लिए “सुरक्षित और सम्मानजनक पक्का आवास” का भरोसा बताया गया था, वही योजना चिल्फी घाटी में मौत का इंतज़ाम बनती दिख रही है।
सरकारी कागज़ों में “आवास पूर्ण”, ज़मीनी ,हकीकत में धंसी छतें, झुकी दीवारें और दरारों से भरे ढांचे—यही हाल है सिवनी कला, भोथी, लूप, साल्हेवारा, बहनाखोदरा और मुड़वाही जैसे गांवों का।
काग़ज़ पर ‘पक्का’, ज़मीन पर ‘खतरनाक’
इन गांवों में दर्जनों घर ऐसे हैं जिनमें:
लेंटर बैठ चुका है या टेढ़ा है
पूरी इमारत एक ओर झुक रही है
दीवारों में गहरी दरारें हैं
तय मानक से छोटे साइज में निर्माण किया गया है
बरसात के साथ हर रात बैगा परिवारों के लिए छत गिरने का डर और गहरा हो जाता है।
“घर मिला, पर डर के साए में”
सिवनी कला के बैगा हितग्राही तिहारो कहते हैं—
“सरकारी रिकॉर्ड में घर मिल गया, पर अंदर बैठना भी डराता है। बारिश में लगता है अभी गिर जाएगा।”
यह सिर्फ एक आवाज़ नहीं, पूरी बस्ती की चीख है।
2 लाख की पूरी किस्त, काम अधूरा—पैसा गया कहां?
ग्रामीणों का आरोप है कि:
हितग्राहियों से कहा गया कि किस्त निकलवाकर एक स्थानीय ठेकेदार को दे दें
बताया गया कि खुर्द निवासी ठेकेदार को इलाके में 30+ आवासों का काम मिला
शुरुआती किस्तों में दिखावटी निर्माण हुआ
पूरी राशि निकलते ही कई मकान अधूरे छोड़ दिए गए
RTI ने खोली ‘ठेकेदारी’ की पोल
सूचना का अधिकार (RTI) के तहत जनपद पंचायत से मिले जवाब ने मामले को और विस्फोटक बना दिया:
योजना में किसी ठेकेदार को अधिकृत करने का प्रावधान ही नहीं
राशि PFMS के जरिए सीधे हितग्राही के खाते में जाती है
सवाल: जब ठेकेदार की कोई वैधानिक भूमिका नहीं, तो उसने दर्जनों घर किसके संरक्षण में बनाए?
तकनीकी खामियां = जान का जोखिम
स्थल निरीक्षण में सामने आया:
घटिया सामग्री
गलत फाउंडेशन
बिना तकनीकी निगरानी निर्माण
मानकों की खुली अवहेलना
यह सिर्फ सरकारी धन की बर्बादी नहीं, बल्कि आदिवासी परिवारों की जान से खिलवाड़ है।
प्रशासन का बचाव—जिम्मेदारी किसकी?
जनपद पंचायत अधिकारियों का कहना है:
पैसा सीधे हितग्राही के खाते में गया
कुछ हितग्राही निर्माण कराने में सक्षम नहीं थे
“पैसा लेकर काम छोड़ने” के मामले सामने आए
FIR की चर्चा के बाद कुछ जगह काम दोबारा शुरू, कई पंचायतों में अब भी ठप
लेकिन निगरानी किसने की?
तकनीकी स्वीकृति और जियो-टैगिंग के बावजूद ये खामियां कैसे पास हुईं?
बैगा परिवारों की मांग—जांच नहीं, इंसाफ
ग्रामीणों का साफ कहना है:
तकनीकी ज्ञान न होने से स्थानीय प्रभावशाली लोगों पर भरोसा किया
जिन पर पंचायत/अधिकारियों का अप्रत्यक्ष संरक्षण बताया जाता है
सभी आवासों की स्वतंत्र तकनीकी व वित्तीय ऑडिट हो
दोषी ठेकेदारों के साथ जिम्मेदार अफसरों पर भी कड़ी कार्रवाई हो
खतरनाक घरों में रह रहे परिवारों को तत्काल सुरक्षित आवास दिया जाए
निष्कर्ष
चिल्फी घाटी में जन-मन आवास योजना कल्याण नहीं, चेतावनी बन चुकी है।
अगर समय रहते जवाबदेही तय नहीं हुई, तो ये धंसे हुए घर किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहे हैं—और तब काग़ज़ी “पूर्णता प्रमाणपत्र” किसी की जान वापस नहीं ला पाएंगे।
यह रिपोर्ट सवाल पूछती है—
क्या आदिवासियों के हिस्से की योजनाएं सिर्फ फाइलों में पक्की और ज़मीनी हकीकत में खोखली ही रहेंगी?


