रसूख के आगे नतमस्तक नियम मुख्यालय छोड़ शहरों में बसे मैदानी कर्मचारी**

ग्राउंड रिपोर्ट | कबीरधाम। ब्रजेश गुप्ता
सरकारी सेवा की बुनियादी शर्त होती है—जनसेवा और निर्धारित मुख्यालय पर अनिवार्य निवास। लेकिन कबीरधाम जिले में यह नियम अब केवल फाइलों और आदेश पुस्तिकाओं तक सिमटकर रह गया है। वन, पुलिस और राजस्व जैसे संवेदनशील विभागों में तैनात मैदानी कर्मचारी खुलेआम नियमों को ताक पर रखकर शहरी जीवन का सुख भोग रहे हैं, जिससे वनांचल और ग्रामीण क्षेत्रों की प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है।
मुख्यालय में नाम, शहरों में ठिकाना
पंडरिया, बोड़ला और कवर्धा ब्लॉक के दूरस्थ अंचलों में पदस्थ कर्मचारी अपने निर्धारित मुख्यालय में रहने के बजाय नजदीकी शहरों में डेरा जमाए हुए हैं। स्थिति यह है कि कई कर्मचारी दिन में महज एक-दो घंटे के लिए कार्यालय या थाने में उपस्थिति दर्ज कराते हैं और फिर शहर लौट जाते हैं।
विडंबना यह कि वेतन, भत्ते और तमाम सरकारी सुविधाएं पूरी चाहिए, लेकिन जब जिम्मेदारी निभाने और मुख्यालय में रुकने की बात आती है, तो नियम बोझ लगने लगते हैं।
‘मजबूरी’ का रटा-रटाया राग
जब भी उच्चाधिकारियों द्वारा मुख्यालय में निवास को लेकर सख्ती की जाती है, तो कर्मचारियों के पास बहानों की लंबी सूची तैयार रहती है—
कभी बच्चों की पढ़ाई, कभी वृद्ध माता-पिता की देखरेख, तो कभी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी।
सवाल यह है कि क्या सरकारी सेवा की शर्तें कर्मचारियों की निजी सहूलियत के हिसाब से तय होंगी?
या फिर सेवा में आने से पहले ये शर्तें अज्ञात थीं?
अधिकारियों की चुप्पी, स्वेच्छाचारिता को संरक्षण
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि विभागीय अधिकारी सब कुछ जानते हुए भी मूकदर्शक बने हुए हैं।
क्या आला अधिकारियों ने कर्मचारियों की मनमानी और रसूख के आगे घुटने टेक दिए हैं?
जब नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई नहीं होती, तो अनुशासन की उम्मीद कैसे की जाए?
और जब रक्षक ही नियमों की धज्जियां उड़ाएंगे, तो आम जनता की सुनवाई कौन करेगा?
होम पोस्टिंग से निष्पक्षता पर सवाल
कुछ वर्ष पहले तक पुलिस, वन और राजस्व जैसे संवेदनशील विभागों में यह सख्त नियम था कि कर्मचारी की पदस्थापना उसके गृह क्षेत्र में नहीं की जाएगी, ताकि स्थानीय दबाव, पक्षपात और हितों के टकराव से बचा जा सके।
लेकिन वर्तमान हालात इसके ठीक उलट हैं। कवर्धा और पंडरिया क्षेत्र के थानों, तहसीलों और वन परिक्षेत्रों में स्थानीय कर्मचारियों की “फौज” तैनात है।
सूत्रों की मानें तो इन नियुक्तियों के पीछे धनबल और राजनीतिक रसूख की बड़ी भूमिका है। यही कारण है कि नियमों की खुलेआम अवहेलना के बावजूद न तो स्थानांतरण होते हैं और न ही कोई ठोस कार्रवाई।
ग्रामीण व्यवस्था पर सीधा असर
मैदानी अमले की गैरहाजिरी का खामियाजा सीधे ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों को भुगतना पड़ रहा है।
शिकायतों का निपटारा नहीं हो रहा, आपात स्थितियों में अधिकारी-कर्मचारी उपलब्ध नहीं मिलते और कानून-व्यवस्था से लेकर वन संरक्षण तक सब कुछ भगवान भरोसे चल रहा है।
अब सवाल यह है—
क्या शासन-प्रशासन नियमों की सख्ती बहाल करेगा,
या फिर रसूख के आगे नियम यूं ही नतमस्तक बने रहेंगे?




